My New Window

Shabana Khatun
Member of YRC Roshni

I am Shabana, I live in a slum area of Rajabazar. Now I am 28 years old. My father passed away when I was 5, our family went through very hard times.

When I recall my childhood, my heart feels heavy. My mother and sisters used to be away, working in other people’s homes. My whole childhood went by in doing housework and in play. I was like one of those paper planes that children fly, that has no direction. When I saw other kids eating something good or wearing nice clothes, I used to feel very bad.

One afternoon my friend Mussarat and I were sitting outside my home, chatting. I told her that I had never tasted ice-cream or chocolate. I had no idea that she would actually get these things for me! Within a day or two, she did, and I tasted the first Cadbury Chocolate of my life! I was 8 years old then. While eating, I started to cry.I felt that I shouldn’t be jealous of other children. I ought to be happy with what I have. Till today, I feel grateful for the fact that my friend understood me on that day and fulfilled that small desire of mine.

At that time, I had a big wish to go to school. My mother told me that she didn’t have so much money. I used to cry a lot when I saw other children wearing uniforms and going to school. I used to long for it. I even stopped eating for some time because of this. Then my mother got to know of a free government school that was quite near our home, and got me admitted there. At this school there was no uniform; we used to wear the same clothes we wore at home. By then I was much older than my classmates. They were perhaps 4-5 years old and I was 8. At such ages, a difference of even 2-3 years is perceived deeply. Because of this, I used to have difficulties in class and they took time to accept me. I left that school after 2 years, studied hard at home to improve my academic level, and got re-admitted in a private school, in an age-appropriate class.

For all this, I am grateful to my mother. She supported my education despite a lot of difficulties. She used to ask others for old books and give them to me. She used to arrange money in whatever way she could. At this time, it was necessary for me to take tuitions, but that too required money which we didn’t have. I was becoming weaker and weaker in class. At this time my elder brother stood by me; he gave me strength and motivation by arranging for my tuitions. It is because of my mother and my elder brother that I could get an education.
Today I want to express my gratitude for some people. To my friend Shahina, who brought me out of my melancholy and isolated existence and taught me to live more meaningfully. I am also grateful to TF for opening up a whole new window for me. I took many trainings from here, and this has increased my self-confidence.

When I took my first step in the world outside my home, I thought, “Is the world really so beautiful then?” And I felt then that life was smiling and telling me, “Live this way! This is what life is about.” When I placed moments from my life in front of me and observed them, I felt that my past had been spent in such a dark spot in a dark world where not a single ray of light could enter. But now I am in a place where all that lost light is burning brightly, and I get whatever I wish for. What I used to long for and see only in my dreams, I am fulfilling each of those things!

Today I have started thinking for others, and working to stop domestic violence in my community.
I now tell girls in my area that doing household chores and getting married at a young age are not the purpose of life. They too have the right to see and interact with the outside world, to live life on their own terms and for this, standing on their own feet is necessary.

मेरी नई खिड़की

मैं शबाना। राजाबाज़ार के एक slum area में रह्ती हुं। अभी 28 साल की हुं। मैं जब 5 साल कि थी, तब अब्बू गुज़र गये। परिवार में बहुत गरीबी थी। जब मैं मेरे बचपन याद करती हुं, तो बहुत मायूस हो जाती हुं। माँ और बहने दुसरे लोगों के घर में काम करने के लिए चले जाते थे। पूरा बचपन घर के काम में और खेल कुंद में गुज़रा। मैं वो उड़ान के तरह थी जोह बच्चेलोग कागज़ से बनाते हैं और उड़ाते हैं - जिसका कोई दिशा नहीं होता है। जब मैं दूसरे बच्चे को देखती थी, अच्छे चीज़ खाते हुए या अच्छे कपड़े पहने हुए, तब मुझको बहुत बुरा लगता था।

एक दिन दोपहर मैं और मेरे दोस्त मुससारत हमारे घर के बहार में एक पक्के के उपर बैठ के बातें कर रहे थे। उस दौरान मैंने उसको बोली की मैंने कभी icecream या कैडबरी नहीं खाए। मुझे नहीं पता था की वोह वाके वो में मुझको यह चीज़ लाके देगी! दो-एक दिन के अन्दर मैंने मेरे ज़िन्दगी की पहली कैडबरी खाया! तब मैं 8 साल की थी। खाते खाते मेरे आँखों में आंसू आ गए। तब मुझ लगा की मुझे दुसरे बच्चो को देखकर हिंसा नहीं करना चाहिए। हम जैसे हैं, उसी में खुश रहना चाहिए। आज भी मैं मुससारत से grateful हूँ की वो उस दिन मुझे समझी थी और मेरा छोटा सा चाहत को पूरा किया।

उस समय मुझे पड़ने-लिखने की बहुत इच्छा थी। पर अम्मी ने बोली की मुझे पड़ाने के लिए इतना पैसा हमारे पास नहीं है। मैं बहुत रोती थी, जब मैं दूसरे बच्चे को ड्रेस पेहेनके स्कूल जाते देखती थी। मेरा भी बहुत दिल करता था। इसके लिए कई दिन मैं खाना भी नहीं खायी। तब अम्मी ने एक free सरकारी स्कूल का पता लगायी जो पास में ही था। मुझे वहां दाखिला करवाया। इस स्कूल में uniform नहीं था, हम लोग घर के कपरे पेहेनके ही जाते थे। मेरा उमर क्लास के बाकि बच्चे से ज्यादा हो गया था। वोह लोग शायद 4-5 साल के थे और मैं 8। इस उमर में 2-3 साल का फरक बहुत ज्यादा महसूस होता है। क्लास में भी इस लिए मुझे बहुत दिक्कत होता था, और उन लोगो को भी समय लगा मेरेको accept करने में। दो साल के बाद में वो स्कूल छोर दिया, घर में पड़ाई करके अपना level बड़ाया, और उसके बाद एक प्राइवेट स्कूल में फिरसे admission लिया age-appropriate क्लास में।

इस सब में मैं अपनी माँ के पास बहुत grateful हूँ। बहुत मुसीबत रहते हुए भी वो मेरे education support किये। वो ही दुसरे बच्चो से पुराना किताब मांग के मेरेको देते थे। कहीं से भी पैसे की इन्तेज़ाम करते थे। इस समय tuition भी लेना ज़रूरी था पर उसके लिए और खर्चा होती जो हमारे पास नहीं था। मेरा पराई बहुत कमज़ोर होता जा रहा था। इस समय मेरा बड़ा भाई मेरा हिम्मत और हौसला बढाया। वो मेरे tuition का इंतेज़ाम कर दिया। मम्मी और उनके लिए ही मैं पड़ सकी।
आज मैं कुछ लोगों को thanks देना चाहती हूं। मेरे दोस्त शाहीना को, मुझे मेरे गुमसुम, चुपचाप, सबसे अलग होके जीनेवाली ज़िन्दगी से निकल के लाने के लिए और मुझे इन्सान के तरह जीने का तरीका सिखाने के लिए। मैं Thoughtshop Foundation से grateful हूं मेरे लिए एक अलग सा खिरकी खोलने के लिए। यहांसे मैंने बहुत सारे trainings किये और मेरा आत्मविश्वास बड़ा।

मैं अपनी ज़िन्दगी की वो पहली कदम जब बाहर कि दुनिया में रक्खा, तो सोची कि दुनिया इतनि खूबसूरत भी होती है! और मुझे तब ऐसा लगा कि ज़िन्दगी मुसकुरा के कह रही है, "जियो इस तरह! ज़िन्दगी इसी का नाम है।" आज मैं मेरे ज़िन्दगी के लमहे को जो सामने रखकर देखा तो मुझे यह महसूस हुया कि मेरे बीता हुया कल अँधेरी दुनिया के एक ऐसे नगरी में गुज़रा जहाँ सूरज का कोई किरण नहीं थी। मगर आज मैं उस मकाम पर हूं जहाँपे वो खोयी हुई रौशनी चमक रहा है, और मैं जो भी चाहा, वो मिला। कल मैं जिस चीज़ के लिए तड़पती थी, और जिनको सप्ने में देखा करती थी, वो हर एक सप्ना मैं पूरा कर रही हूँ।

आज मैं दुसरो के लिए मैं सोचने लगी और मेरे community में पारिवारिक हिंसा रोकने के लिए काम करने लगी।
हमारे इलाका के लड़की को अब हम समझाते हैं की घर का काम करना और कम उमर में शादी कर लेना ही ज़िन्दगी की मकसद नहीं है। उनको भी बाहर के दुनिया देखने का और अपने ज़िन्दगी को अपने तरीके से जीने का अधिकार है! और इसके लिए अपने पैरो पर खड़ा होना ज़रुरत है।