Let's Step Out

Shahina Javed
this is Shahina's second post
read her earlier post

So many calamities and accidents happen every day, but that does not scare most people - no Man ever stops going out because of that. No one tells a Man "Don't step out, what if something bad happens!" Women, on the other hand, have to hear it all the time "Something bad may happen to you if you go out!"

I used to think like that too - if a woman steps out at night, she is in danger of losing her honour. Why did I think that? Perhaps society taught me to do so. At times I thought that may be my parents are more concerned about me, because they love me more! Then again I wondered - is society really more concerned about the well being of a woman, or could it be a ploy to keep women imprisoned at home? Is it a way to rob us of our right to mobility? Why do we take it for granted that the woman will certainly be in danger the moment she is out of home?

I feel that may be we are beginning to challenge that kind of thought in the society.

On the 28th of November 2012, four of us girls were aboard the Toofan mail train on our way to Delhi, and we had the responsibility of safely escorting a Man along with us. "Toofan" means 'a raging storm' in hindi; but ironically the train moved sluggishly, more like a fan on a hot day. We were supposed to reach at seven in the evening, but the train rolled into the New Delhi station at 3 a.m. Meanwhile, back home, my father had become very anxious - he would repeatedly call on the phone and say "Look child, a lot of bad things are happening in Delhi nowadays, the city is not at all safe for women. Don't step out of the station in the night!" I was thinking "but Papa, which city is safe for women? What time of day is safe? Even our own neighborhood - would you say girls are safe there?"

Outside the station, at 3 a.m., all the auto-rickshaw drivers gathered around Azhar to pester him "Here Brother - Need An Auto?" It felt strange, how silly of them to ask Azhar. No doubt they were thinking he was the Man in charge of us women. I had the address, so I negotiated with an auto and reached YMCA.

We were there to attend a two day We Can meeting. We discussed about the We Can Coalition, and several people spoke on gender issues. It was here that I heard Madam [A] say "Parents should ensure that there is a room for the girl - because a girl can't live on the streets". I asked her "but why do you say that, we believe in equality don't we?" Madam [A] replied that girls are prone to a different kind of risk of she is out in the streets, that our society was not yet fully transformed.

Somehow I was not happy with that response. This is the very argument that is consistently used to push us back indoors.

Early next morning, the five of us set out to visit Agra. We had a great day roaming the city. We were supposed to return to Delhi by the evening train, but they were all heavily booked, it turned out, and we had to spend a good part of the night at the station. Tehsina struck up a conversation with an Army officer, and he was kind enough to offer us sitting space in the coach reserved for army personnel. We were the only women in the train; it was a little bit scary - four girls, at night, on the way to an unfamiliar city.

We reached New Delhi at 7 in the morning, and headed towards the Jumma Masjid area to check into a hotel. Tehsina and I found a place, negotiated the rates, paid the money - but when it came to signing the register, they insisted on getting Azhar's. That was another strange moment - how they assumed that he was the one responsible. Nevertheless, I was very happy, because regardless of what they thought, we knew who was taking care of whom!

And so, by the next evening we were all back home by the 5 o'clock train, in one piece! And it felt as though I had, in the mean time, discovered the answer to my own question to Madam [A]. Bad things don't happen to girls Every time they go out, accidents could happen, and also Not happen! People are not all bad. That threat that keeps women back, paying heed to it is like being a ghost even before you die.

I've learnt, and I do believe this - If we are not willing to Risk it, how will we know what We Can do?

चलो निकले

हर रोज़ कितने सारे हादसे होते हैं, कितने लोगों के साथ accident होते है, लेकिन इस के डर से कोई लड़का बाहर जाना नहीं छोड़ता - उसे कोई नहीं बोलते "बाहर मत जाओ! कुछ ग़लत हो गया तो?" लेकिन लड़कियों को हमेशा सुनना पड़ता है की बाहर निकलने से कुछ ग़लत हो सकता है।

पहले मैं भी सोचती थी - लड़कियां रात में बाहर निकलेंगी तो उनकी इज्ज़त को खतरा होगा। पता नही मैं ऐसा क्यों सोचती थी, शायद इस समाज ने ही मुझे ऐसी सोच दिया था। फिर लगा, शायद मम्मी पापा को मेरी ज्यादा फ़िक्र थी - मुझसे ज्यादा प्यार करते है, इस लिए!
मेरा सवाल था - क्या समाज को लड़कियों की ज्यादा परवा होती है, या फिर हमें घर पर कैद रखने की कोशिश? यह फिर हमारी mobility का हक छीना जा रहा है। हम ऐसा सोचही लेते हैं की लड़कियां बाहर निकलेंगी तो गलत ही होगा!

समाज की ऐसी सोच को लग रहा था के हम लोग challenge कर रहे हैं…

28 नवम्बर 2012 तारीख को हम चार लड़कियां - जिनके ऊपर एक लड़के को संभल कर दिल्ली ले जाने की ज़िम्मेदारी थी - हम लोग तूफान मेल एक्सप्रेस से दिल्ली जा रहे थे। तूफान मेल - जिसका नाम ही तूफान, लेकिन वो ट्रेन ऐसी चल रही थी जैसे गर्मियों मैं फेन चलती है। हमारी ट्रेन, जो श्याम सात बजे दिल्ली पहुंचने वाली थी, वो रात के तीन बजे नई दिल्ली स्टेशन में लगी! घर मे पापा बहुत परेशान हो रहे थे, बार बार फ़ोन कर रहे थे और मुझे बोल रहे थे - "देखो बेटा, दिल्ली मैं बहुत सारे हादसे हो रहे हैं, वो शहर लड़कियों के लिए सही नहीं है। रात में स्टेशन से बाहर नहीं निकलना!"
मैं सोच रही थी की पापा कौन सा शहर लड़कियों के लिए safe है? कौनसा वख्त लड़कियों के लिए safe है? मेरा अपना शहर कोलकता - वहां भी तो हम इस तरह के हादसे सुनते है; या फिर मेरा मोहल्ला क्या वहां लड़कियां safe हैं?

Azhar napping at the Agra station
रात के तीन बजे स्टेशन से बाहर निकलते वख्त ऑटो वाले अज़हर को परेशान कर रहे थे - "भैय्या ऑटो चाहिए?" अजीब लग रहा था - सब अज़हर से क्यों पूछ रहे है? शायद सोच रहे थे वो लड़का है और वही हम लोगों को लेकर जा रहा है। मेरे पास पता था, मैंने ऑटो वाले से बात की, और YMCA होस्टेल गए, जहां हम लोगों का We Can का प्रोग्राम था।
वहां दो दिन "मुमकिन मंच" को लेकर बातचीत हुई, जहां काफी सारे लोगों ने Gender issue पर बात की, जहां एक मैडम ने लड़किओं के लिए कहां था के - माँ बाप को लड़कियों के लिए एक घर ज़रुर रखना चाहिए, क्योंके लड़कियां तो बाहर नहीं सो सकती। मैंने उनसे पूछा "हम लोग तो बराबरी में यकीन करते है तो आप ऐसा क्यों बोल रही है?" उन्होंने कहा "लड़कियां बाहर सोने से दूसरा तरह का खतरा हो सकता है, हमारा समाज अभी पूरी तरह से नहीं बदला…"

मैं ये जवाब से खुश नहीं थी। यही एक वजह दिखाकर हमेशा हमें पीछे कर दिया जाता है…

Shahina, Tehsina, Sangita and Shampa
at the Taj Mahal. Azhar behind the camera.
हम लोग दुसरे दिन सुबह आगरा जाने के लिए निकले। पुरे दिन आगरा घूमे, बहुत मज़ा किये। रात की ट्रैन से वापस दिल्ली आना था, लेकिन उस वख्त कोई ट्रैन नहीं मिलने की वजह से हमें काफ़ी देर तक स्टेशन में रहना पड़ा। स्टेशन मे तह्सिना की एक army officer से दोस्ती हुई। उन्होंने हमे army coach मे बैठने दिया। पूरा ट्रैन में सिर्फ हम चार लड़कियां, और बाकि सब लड़के थे! थोड़ा डर भी लग रहा था - अंजान शहर, रात का वख्त, और हम लड़कियां!
सुबह सात बजे हम दिल्ली पहुंचे। वहां से हम जुम्मा मस्जिद के पास एक होटल मे रुम लेने गए। मैंने और तह्सिनाने मिल कर रुम की बात की, रूपया दिया - लेकिन जब रेजिस्टर sign करने का वख्त आया, तो वो लोग ने अज़हर का ही sign लिया। काफी अजीब लग रहा था - लड़का होने से ही उसे ज्यादा ज़िम्मेदार समझ लेते है! पर इन सभी चीजों के बाद भी मैं बहुत खुश थी। लोग चाहे कुछ भी सोचे, पर हम लोग जानते थे कौन किसको protect कर रहे थे।

और उसी दिन शाम पांच बजे की ट्रैन से हम सही सलामत अपने घर कोलकता पहुंचे!

लेकिन मैडम की जो जवाब से मैं खुश नहीं थी, शायद उसका जवाब मुझे मिल गया था। ज़रूरी नही जब कभी लड़की बाहर निकले तो उसके साथ ग़लत हो - हादसा तो किसी के साथ भी हो सकता है, और नहीं भी। सारे लोग बुरे नही होते। एक ही वजह बता कर हमेशा लड़कियों को आगे बढ़ने से रोका जाता है; ये तो वही बात हुई - मरने से पहले ही हम लोग भूत बनने के बारे में सोचते हैं…

मैंने तो यही सीखा है और believe करती हूँ - Risk नहीं लेंगे तो जानेंगे कैसे की मुमकिन क्या है!