I Believe - Tahsina

Tahsina Bano is a member of YRC Roshni (2009)
Change Maker, Gender Volunteer (2011)
TF Youth Facilitator (2012)
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"I believe that if we open our minds and speak out, then we will succeed in every situation"
Tahsina Bano

I am a 23 year old girl and my name is Tahsina Bano. I started believing this around 3 years back. Then I wasn't even aware that every person could have a system of beliefs or values. It never even crossed my mind that I needed to study and do something in life, or that I would be able to travel long distances alone, because I come from a Muslim family.

I didn't have the freedom to do anything other than my studies, and that too, we were given an education to better our marriage prospects. People in my family couldn't even think of me getting a job or going outside of home. At that time I used to tie my hair into two pigtails and go to school; I used to keep myself tightly wound up, like those pigtails.

When I saw anyone in some job, I also wanted to get such a job. When I saw people falling in love or going out, I also wished that I could fall in love or go out with my friends. But how could I do these things - I was a girl, that too a Muslim! My mother fulfils the role of a good wife, and so does my sister-in-law. In such a situation, my going out of home and getting a job was unthinkable.

In my home, people didn't even talk to one another properly. Everyone has their own work and it kept them busy. If one wanted to do something after completing one's education, the most one could do was to become a teacher, which I didn't want in any case. And yes, even if you became a teacher, you had to go to your workplace after doing all your housework, and you were expected to complete the remaining work again after you returned.

Anyhow, one day I met a girl in my neighbourhood – Shahina didi. She used to help people a lot. She was a Youth Trainer in an organisation called Thoughtshop Foundation. I had heard that in this organization, different kinds of trainings happen for youth. Shahina didi told me about these things. I liked it a lot and told my Ammi that I wanted to get this training. At first she was unwilling even to listen. Then I and Shahina didi together persuaded her to let me go, as the training was only for a year, and that too once a week.

Ammi was persuaded after a lot of effort, but my Abbu and my elder brother were not ready to accept this. They used to say that if a girl goes outside so much, she becomes a bad person. Still, I made excuses of going to college or coaching classes and started taking this training. At that time, I could attend it only twice in a month.

Whatever I learnt, I would share it with Ammi in the presence of other family members, even though they pretended they couldn't hear it. But I persisted in speaking aloud so that everyone could hear about what I was involved in.

While taking this training, I had to face many challenges, like acting in a street play in my neighbourhood. My elder brother told me, "If you repeat such a thing a second time, I will not consider you to be my sister." At that moment, I kept shut but I persisted in my efforts to bring my family around.

Today I am able to share whatever is there in my heart openly in front of everybody. Today, if any decision is made at home, my opinion is also taken into account. My elder sister was married off when she was just 18. She had wanted to become a teacher but my elder brother had said at that time that it was no use educating her further, as she would only be married off and it wouldn't serve any purpose. So she got married at a young age to someone she didn't like. But today my Ammi wants me to study further, even though I have completed my BA.

Today, at 23 years of age, I am going to get married to the person I like. I could never ever think that such opportunities would come in my life! And in this way I brought change in myself, changed the way my family thought, and this is how my whole world changed.

"मेरा विशवास  है के मन खुलकर अगर हर बात बताये तो हमें हर जगह कामयाबी मिलेगी"
तह्सिना बानो

मैं एक २३ साल की लड़की हूँ और मेरा नाम तह्सिना बानो है। मेरा यह  विशवास मेरे उन्दर आया तक़रीबन तीन साल पहले। तब मुझे यह पता भी नहीं था की हर इन्सान का एक 
विशवास, या वैलू-सिस्टम हो सकता है। मै सोचती तक नहीं थी के मुझे पढ़कर कुछ करना है, या मैं खुद अकेले दूर दूर जगह जा पाऊँगी, क्योंके मैं एक मुसलिम फॅमिली से हूँ।

मुझे सिर्फ पढ़ाई के इलावा और कुछ करने की आज़ादी नहीं थी, और पढ़ाया भी जाता था तो सिर्फ इसलिए के कोई अच्छी जगह शादी हो पाए। मेरे घर के लोग तो यह सोच भी नहीं सकते के मैं कोई नोकरी करूँ या बहार निकलूं। उसवक्त मैं दो चोटी बांध कर स्कूल जाती थी, और हर वक़्त उस चोटी की तरह खुद को बांध कर रखती थी।

किसीको भी कोई काम करते देख के मेरा भी मन करता के मैं भी वह काम करूं। किसी को प्यार करते देखकर, या बहार घूमते देखकर मेरा भी मन करता के मै भी प्यार करूं या अपने दोस्तों के साथ घुमने जाऊं। पर मैं यह सब कैसे कर पाती - मै तो एक लड़की थी, वो भी मुसलिम! मेरी अम्मी एक अच्छी बहु है और मेरी भाबी भी। इस जगह मे मैं बहार निकल कर कोई काम करूं, यह तो नामुमकिन है।

मेरे घर पर तो सहिसे कोई एक-दुसरे के साथ बात भी नहीं करता था। सभी लोग अपने अपने काम से मतलब रखते थे। पढ़ाई करके अगर कुछ बन पते तो वह सिर्फ टीचर - जो मुझे बनना पसंद नहीं था। और हाँ, अगर कोई टीचर भी होता, तो उससे घर का सारा काम कर के जाना पड़ता था, फिर स्कूल से आने के बाद भी पूरा काम करना पड़ता था।

खैर, एक दिन मुझे मेरे पाड़ा मे एक दीदी मिली - शाहीना दीदी। वह हमारे पाड़ा के लोगो का बहुत मदत करती है। वह Thoughtshop Foundation बोल के एक organisation में यूथ ट्रेनर थी। इस organisation मे बहुत तरह का यूथ development ट्रेनिंग होता है। इस के बारे में मुझे शाहीना-दी बताई। मुझे सुनकर बहुत अच्छा लगा और मै अपनी अम्मी को बोली के मुझे यह ट्रेनिंग लेना है। पहले पहले तो अम्मी सुनने को तैयार ही नहीं थी। फिर मै और शाहीना-दी मिल कर अम्मी को समझाए के सिर्फ एक साल का ट्रेनिंग, और हफ्ते मे सिर्फ एक बार जाना पड़ेगा।

अम्मी तो बहुत मुश्किल से मान गए, पर अब्बू और मेरे बड़े भाई राज़ी नहीं थे। वो कहते थे के ज्यादा बाहार जाने से लड़की ख़राब हो जाती है। लेकिन फिर भी मै कोचिंग या कॉलेज के बहाने बनाके वह ट्रेनिंग लेना शुरू की। महीने में सिर्फ दो दिन ही जा पाते थे।

उस दो दिन में जो कुछ भी सीखते उससे हम सबकी मौजूदगी मे मै अपनी अम्मी से शेयर करते थे। परिवार के दुसरे लोग शायद उसवक्त सुनकर भी अनसुना कर देते थे - पर मै उनके कान तक अपनी बात 
हुंचा करती थी।

इस ट्रेनिंग को लेने के दौरान मुझे बहुत सरे challenge का सामना करना पड़ा, जैसे मुझे अपने पड़ा में एक स्ट्रीट प्ले करना पड़ा। मेरे बड़े भाई ने मुझे कहा "अगर दुबारा ऐसा कोई काम कीया तो तूम मेरी बहेन नहीं रहोगी"। उस वक़्त तो मै खामोश हो गई पर मै अपने परिवार को राज़ी करने का कोशिश हमेशा जारी रखखी।

आज हम अपने हर बात मन खोल कर कह पाते है। आज घर में कोई भी फैसला लिया जाता है तोह उस फैसले में मै भी शामिल रहती हूँ। मेरे बहेन (दीदी) की जिस वक़्त शादी हुई उस वक़्त वह सिर्फ १८ साल की थी। उसको टिचर बनने का शौक था, पर मेरे बड़े भाई ने कहा के पढ़कर क्या होगा - शादी ही तो करना है....। इसकी वजह से उनका कम उम्र में शादी हो गया और जिससे उन का शादी हुआ वह लड़का मेरी दीदी को पसंद नहीं था। पर आज मेरी अम्मी मेरे B.A. तक पढ़ाई करने के बावजूद आगे पढ़ाई करने को कह रही है।

आज मै २३ साल में अपने पसंद के लड़के से शादी करने वाली हूँ। यह मौका भी मेरे ज़िन्दगी में आ सकता था मै तो सोच भी नहीं सकती थी। और इस तरह मैंने अपने आप में बदलाव लाई, अपने परिवार का सोच बदला और र्मेरी दुनिया बदल गयी।